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शीर्षक: अंधभक्त नगरी चौपट प्रधानमंत्री



[पर्दा खुलता है]

(दरबार में सब यथास्थिति विराजमान थे)

आज दरबार में राजा व्याकुल मालूम पड़ते थे, वो शांत और गहरी चिंता में मग्न थे, तभी एक व्यक्ति उनके पास आ कर उनके कान में कुछ फुसफुसा कर चला जाता है।

राजा (हैरानी से पूछा) – राजवैध, हमारी गुप्तचर समिति ने बताया है की राज्य की हवा अब विषैली हो गई है, इसे लोग मारे जा रहे है।

 ( राजवैध अपनी गद्दी से खड़े होते है।)

राजवैध – जी राजन, ये सारी गलती दाढ़ी वाले बाबा की है, वो प्रातः जल्दी उठ कर सारी ऑक्सीजन अपने चेलों के साथ ग्रहण कर लेते है।

राजा – प्रधानमंत्री, उसे आज ही फांसी दे दी जाए

(प्रधानमंत्री अपनी गद्दी से खड़े होते है।)

प्रधानमंत्री – राजन, ये करना मुश्किल है, क्योंकि आपको राजा बनाने में उनका ही हाथ है।

राजा – उद्योग मंत्री,आप जल्द ही अपने राज्यकीय संयंत्र में ऑक्सीजन का निर्माण करे और रेल के माध्यम। से सारे राज्य में पहुंचाए।

(उद्योग मंत्री अपनी गद्दी से खड़े होते है।)

उद्योग मंत्री – राजन, सारे संयंत्र तो प्रधानमंत्री जी ने देश के साहूकारों को बेच दिया है। हमारे पास कोई भी संयंत्र नही है।

राजन – प्रधानमंत्री, जाओ अपनी सेना ले कर और सारे संयंत्र पर वापस से अधिकार प्राप्त कर लो।

(प्रधानमंत्री अपनी गद्दी से खड़े होते है।)

प्रधानमंत्री – राजन, हमारी ऐश-ओ-आराम का सारा प्रबंध वही साहूकार करते है।

राजा – गृहमंत्री , पिछले कई सालो में जो युवाओं को भर्ती किया हैं। उनको लेकर नए संयंत्र में काम करो।

(गृहमंत्री अपनी गद्दी से खड़े होते है।)

गृहमंत्री – राजन, हमने तो युवाओं को रोजगार दिए ही कहा है? हम तो पड़ोसी राज्यों से लड़ने में व्यस्त थे।

राजा – हमसे कौन युद्ध करना चाहता है, किसकी भुज में इतना बल आ गया है।

गृहमंत्री – राजन, वो सिर्फ युवाओं को बेवकूफ बनाने के लिया था, जिससे वे रोजगार न मांगे और कोषालय का धन हमारे पास ही रहे।

राजा – इस समस्या का हल क्या है? इसके लिए एक समिति बनाओ जो इसका हल ढूढे, विदेशो में हमारी काफी बुराई हो रही।

[पर्दा गिरता है।]

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निर्भरता

👇👇

किस्से, कहानी, अनुभव और विचार ...... कुछ आपके कुछ हमारे.

काफी दिनों से एक सोच थी दिल में कि शुरुआत कहां से की जाय आप सभी से रुबरु होने की, आखिर आज वजह मिल ही गयी।
वजह एक ऐसी जिसका ज़िक्र हम और आप और न जाने कितने ही लोग अक्सर करते हैं, वजह जिस पर बातें तो की जाती हैं लेकिन निदान आखिर क्या हो इस पर चर्चा कोई नहीं करता।
चैत्र शुक्ल पक्ष-8 अष्टमी तिथि… कितना पवित्र दिन? नवरात्र के दौरान पर्व को देखते हुए इस तिथि का बहुत ही बड़ा महत्व है। लोग सुबह सवेरे से नहा-धोकर पवित्र होकर, स्वच्छ होकर माता के दर्शनों के लिए मंदिरों को जाते हैं पर होता क्या है? हमें गुजरना होता है उन रास्तों से जहां होता है कूड़ा-करकट, गुटखे, तंबाकू और पान की थूकी गयी पीक…. जिन पर से होकर हमें और सारे श्रद्धालुओं को गुजरना पड़ता है। यहां विचारणीय यह है कि तब हम क्या वास्तव में पवित्र रह…

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Posted in 01:00am thoughts, कविता

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यू ही इंस्टा में फॉलो आ गया
हम भी बेखबर थे।
इसलिए बिना जाने फॉलो बैक कर दिया।
थोड़ी बाते होने लगी।
न जाने कब नंबर दिया।
न जाने क्यों दिया।

यू ही कहा मैने
कल 2 बजे
आपके फोन का इंतजार रहेगा।
वो बेवकूफ
सच में कॉल कर बैठी।
बात यू तो लंबी न हो सकी,
लेकिन समय ने इन्हे बढ़ाया ही।

अब मैसेज कम
कॉल ज्यादा होने लगे।
हम खास तो नही थे,
लेकिन अब साथ थे।
वो हार पकाओ बात
सहेली की तरह मुझे बताती,
मै उसे अपने किस्से दोस्तो की तरह
बेफिक्र गली देते हुए सुना देता।

कब बाते दिन से
रात में होने लगी
पता ही नही चला।
एक रात यू ही बात करते
वो छत आ गई।
छोटी सी बात
हर बार की तरह लंबी हो गई।
समय का पता ही नही रहा।
जब पैरो की आवाज सुनी,
तो वो नीचे आई
मां को देख वो बेहोश हो गई।
उस रात मैने जो किया,
मुझे भी नही पता क्यों किया।

अब बाते काल से निकल कर
वीडियो कॉल्स पर आ गई।
समय के साथ
हम एक दूसरे के और खास हो गए।
मेरे बुरे वक्त में उसे ज्यादा किसी ने
साथ नही दिया।
मै समय बिना देखे उसे बात करता,
वो भी कभी नही बोली की मुझे कोई काम है।

ये 6 माह की दोस्ती ने
उन 16 साल के दोस्तो से
ज्यादा ही कर दिया।
इसे रोज कहता हु,
तुझ से बाते बंद कर दूंगा।
शायद ऐसा कर ही न सकता।

कभी -२ मुस्कुराकर
सारे गम छिपा लेती है,
लेकिन जितना भी में समझ पाया हूं,
आंखे सब बता देती है।
वो कोशिश करती है,
सब छुपा लूं, पर छुपा नही पाती।

आज भी उसके चेहरे की
एक मुस्कान मेरी सारी परेशानी दूर कर देती है।
वक्त तो साल भी पूरा नहीं कर पाया,
लेकिन हमने जिंदगी काफी जी ली।
गर्लफ्रेंड कैसी होती है पता नहीं
लेकिन ऐसी फ्रेंड हो तो
जिंदगी काफी आसान हो जाती है।

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Banaras

आखिर क्या है बनारस में ??
एक काशी विश्वनाथ जी का मंदिर ना होता तो बनारस को कोई जानता तक नहीं??

ऐसी सोच वालो को #शिवरात्रि पर बनारस आना चाहिए !!
दरअसल वाकई में बनारस में कुछ नही है ,क्योकि आप बनारस को बाकी शहरो जैसे नही देख सकते ,बनारस को देखने के लिए ठहराना पड़ेगा, रुकना पडेगा!!

बनारस को तब देखिये जब कुछ देखने की इच्छा खत्म हो जाए ,एकदम फुर्सत में !
बनारस पानी का एक बुलबुला है। आप देख सकते है , पकड़ नही सकते !!
बनारस आसमान में बादल है !
दरअसल ये दिखता है लेकिन है नही !
दिखता किसको है?
जो इसको समझता है !
किसके लिए बनारस कुछ नही है ??
जो इसे समझ नही पाया हो !

आइये शिवरात्रि है ,देखिये बनारस !
हफ़्तों पहले से तैयारी शुरू है,काशी विश्वनाथ में ,हर छोटे बड़े मंदिरों में !
तैयारी, अरे भाई शिव की नगरी है ,शिव की शिवरात्रि है,शिव की काशी है !
रात से ही बाबा के भक्तों की लाइन लग गई है ,वो भी दो किलोमीटर की लंबी लाइन !

दिन भर से थके हुए बाबा की अभी शयन आरती हुई है ,बाबा सोये हुए है !
सुबह की भोर की आरती होगी, पट खुलेंगे और फिर “नमः पार्वती पतये -हर हर महादेव “, बाबा दिन भर यही सुनते है ! बाबा को सुननी भी सबको है !

शिवरात्रि की रात से ही बनारस के हर मंदिरों का मौहाल एकदम भक्तिमय होता है ,हर तरफ भजन कीर्तन चल रहां है !
सब चल रहा है ,लग ही नही रहा की रात का वक्त है, मैदागिन से ज्ञानवापी और दशाशुमेध का इलाका तो और भक्तिमय है !
भक्त गंगा में स्नान करके लाइन में लगते है बाबा के दर्शन के लिए
भोर की आरती के बाद काशी विश्वनाथ के पट खोले जाएंगे, आज बाबा को फुर्सत नही मिलने वाली क्योकि आज बीच में आराम नही मिलने वाला, अब ये दर्शन दूसरे दिन तक लगातार चलेगा ,
रोड किनारे कई स्वयं सेवी संस्थानों ने फल और फलाहारी की निशुल्क व्यवस्था करते है !

आज का दिन बनारस(काशी) के लिए ख़ास है, आज शिवरात्रि है !
लेकिन आज बनारस वाले बाराती बनेंगे, बाराती किसके ??
अरे भाई अपने भोले बाबा की आज शादी है शाम को बरात निकलेंगी, बनारस वाले बराती होंगे, घोड़े-हाथी होंगे, देवता होंगे,असुर होंगे,भुत होंगे,प्रेत होंगे और समय होगा !
भोले शंकर दुनिया में देवो के देव है, बनारस वालों के लिए अभिवावक है,पिता है ,बाप है ,बाऊ है !!

आप विश्ववास करिये सच्चा बनारसी भोले शंकर से भी गुस्सा जाता है ! अड़ जाता है, बोल भी देता है–“देखा ई काम ना भयल त सोच लिहा तु”, क्योकि भोले बाबा बनारस वालो के बाप होते है और भोले बाबा होते है अड़भगी और प्रचण्ड जिद्दी, अड़भगी और जिद्दी के होने के मामले में एक बनारसी अपने बाप(भोलेशंकर ) से एक इंच भी पीछे नही होता, जाइये विश्वनाथ में देखिये !
गर्भगृह में पहुँचते ही जोर से चिल्लायेगा ,ताकि महादेव को पता चल जाए की हम आ गए ,या महादेव सोये है तो जाग जाए !
पानी में डालेंगे ,भांग -धतूरा भी चढ़ा देगें!!
जिसको कोई नही ग्रहण करता महादेव का वो प्रिय होता है !
थी किसी को औकात विष ग्रहण कर ले?

जहाँ शिव भगवान नही ,पिता के किरदार में है वो बनारस है !
जहाँ के लोगो को भोले के बरात में शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त होता है,वो बनारस है!
जहाँ कुछ ना होने पर भी सब कुछ होने का अहसास है,वो बनारस है !
दुनिया जिसको ना अपनाती हो जो उसे अपनाए वो अपना बनारस है !

अगली बार बनारस आना तो देखना ये सब, शिव को दूल्हा बने,पार्वती को सजे हुए ,भूतों को बाराती बने हुए ,नाचते हुए ,गाते हुए !
हम रंगभरी एकादसी को गौरी(पार्वती )गौना भी कराते है !

ये भी देखना और फिर वाकई में बोलना की
कुछ नही है बनारस में !!

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धुंधला चेहरा


[लप्रेक]


पटकथा : कृष्णा Instagram: @krishna.67
संपादक : श्याम instagram: @asli_shyam

दिसंबर महीने के अंतिम दिनों में ठंड अपनी चरम सीमा पर होती है। इन दिनों कहीं जाने का मन भी नहीं करता है। आज सुबह तकरीबन ७ बजे आकृति का फोन आया। गहरी नींद में होने के बावजूद उसका फोन मैंने उठा लिया। पहले कभी आकृति ने इतनी सुबह फोन नहीं किया था।

आकृति – ” सो रहे थे क्या?”

नहीं, बिल्कुल नहीं। मै तो इनके ही फोन के इंतजार मै सुबह शाम जागता हूं ना। इतनी ठंड में सोने का कुछ अलग ही मजा आता है। लेकिन इस लड़की को कौन समझाए, सुबह ५ बजे से जाग जाती है।

” हां, बोलो क्या हुआ?”
आकृति – ” sorry”

अंग्रेजो के जाने के बाद जिस चीज ने उनकी गुलामी को याद रखा है। वो है ये sorry जिसका प्रयोग अक्सर ये लड़कियां करती रहती हैं। गुस्सा तो काफी आ रहा है, लेकिन कुछ बोलने का मतलब अपना दिन खराब करना।इसलिए शांति से में जवाब दिया।

” कोई नहीं! कैसे याद किया इतनी सुबह आपने मोहतरमा!”
आकृति – ” तुम्हारी मोहतरमा को जबलपुर जाना है।”
” वो तो रात में ही तुमने बता दिया था। अब क्या लिख कर दु की चले जाओ।
आकृति – ” मुझे तुम स्टेशन तक छोड़ दोगे।”

अगर कोई दूसरा दिन होता तो स्टेशन क्या जगह थी। मै उसे जबलपुर तक छोड़ कर आता लेकिन इतनी ठंड में कैसे, क्यों और मुझे ही क्यों?
जिस तरह से ये लड़कियां अपने काम के लिए मासूम बन जाती है, काश वो सारे वक़्त इतनी मासूम रह पाती। काम होते ही इनके अंदर की काली माता बाहर आ जाती है। फिर भी हां तो करना था ही, जो मैंने की भी।

” ठीक है, १५ मिनिट में आता हूं तैयार हो जाओ।”
आकृति – ” मै तैयार हूं, तुम्हारा ही इंतजार है।”
” ओह हो, ऐसा क्या!”

जब बकरे की बलि दी जाती है तो ऐसे ही अच्छा अच्छा खिलाया जाता है। उनकी खूब सेवा की जाती है, फिर हलाल कर दिया जाता है। आज वो बकरा में था और बारी भी मेरी ही थी।

वैसे मैने हां तो बोल दिया था। लेकिन उन मुसीबतों का ध्यान दिया ही नहीं जो अब सामने आने वाली थी। ये नींद में लिया फैसला नहीं था, ये प्यार में लिया गया था। नींद में होता तो कुछ हद तक बचने की उम्मीद होती लेकिन प्यार में लिया फैसला ग़लत ही होता है।ऐसा किसी महापुरुष ने कहा था। अब लग रहा है कि उनको कितना अनुभव रहा होगा इन सारी बातों का जो आज मेरे साथ घटने वाली थी।

इतनी सुबह कहीं जाने की बात तो छोड़ो, सुबह उठना ही सबको आश्च्यचकित कर देगा। अब प्यार मै झूठ न बोला तो काहे का प्यार। वो कविता है न

” वो काम भला क्या काम हुआ, जिसका खर्चा न सर पर हो। और वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ, जिसका चर्चा न घर पर हो।।”

आखिरकार मै उठ ही गया और दोस्त के पैर टूट जाने का झूठा किस्सा सुना कर घर से बाहर आ गया। गाड़ी एक हफ्ते से चली नहीं थी पर उसके इंजन के गर्म होने से पहले मेरा शरीर गर्म हो गया था। गाड़ी अभी गरम हो ही रही थी कि आकृति ने दुबारा कॉल किया।

अक्सर मैंने देखा है जब लड़कियों को कहीं जाना होगा और वो तैयार हो चुकी हों तो उनको देर पसंद नहीं है। लेकिन तैयार ना हुई हो तो कितना भी समय लग जाए हिम्मत है कि वो चली जाएं, वो जा ही नहीं सकती है।

” हां बस निकल गया।”
आकृति – ” जल्दी आओ, ट्रेन मेरा इंतजार नहीं करेगी।”

तुम तो कर सकती हो मेरा इंतजार। लेकिन यहां मुझे खुद से रहा नहीं जा रहा था। इसलिए मैने जल्दी ही गाड़ी चालू कर ली। ये पहला मौका था, जब मै उसे अपनी गाड़ी के पीछे बैठाने वाला था। इससे पहले कभी उसने ऐसा नहीं कहा था। इस बात के कारण ही बिन दस्ताने के मै उसके घर की ओर निकल पड़ा।

” हां, बस आ गया। ” (ठंड इतनी थी कि मेरे हाथ बर्फ की तरह जम चुके थे)

मैंने उसे दूर से ही देख लिया था। नीली हुडी और काले जीन्स में वो बहुत ही सुन्दर लग रही थी। बाल उसके चेहरे के सामने आ रहे थे, जिस वजह से उसका चेहरा साफ समझ नहीं आ रहा था।जैसे ही मै उसके पास पहुंचा वैसे ही इस चश्मे न सारा दिमाग ही खराब कर दिया। जिनको चश्मा लगता होगा वो ये जानते होगे कि अक्सर ठंड के दिनों में इस पर धुंध छा जाती है। आज भी वहीं हुआ था। जिस चेहरे के लिए मै इतनी ठंड में इतनी दूर तक आया था,उसका ही दीदार नही हो पा रहा था। लेकिन जितना भी चेहरा उस धुंध में झलका वो भी बेहद खूबसूरत था। मै जब तक धुंध साफ करता तब तक वो मेरे पीछे आ कर बैठ चुकी थी। एक बार फिर से मै चेहरा देख ही नहीं पाया। मैंने एक्टिवा स्टार्ट की और स्टेशन की और चल पड़ा।

वो पहली बार मेरी गाड़ी पर मेरे पीछे बैठी थी। ये अनुभव कुछ अलग ही था।ऐसा एहसास पहले कभी नहीं हुआ था। जब मैंने ब्रेक लगाया (ये पहली बार था) तो मुझे कुछ ख्याल न रहा , मै इन सब में ही खो सा गया था। तभी पीछे से आवाज़ आई।

” आराम से चलाओ, इसलिए मै तुम्हारे साथ नहीं जाती।”

ये लड़कियां आखिर इतनी भुलक्कड़ क्युं होती है। थोडे देर पहले इसको ही जल्दी थी और अब ये ही है जो धीरे चलाने का ज्ञान दे रही है।

जिस चेहरे को देखने के लिए इतनी ठंड मै आया था वो मैंने देखा ही नहीं था। इसको देखने के लिए मैंने अपने साइड मिरर को ऊपर किया जिससे उसका चेहरा दिख जाए। पर चेहरा तो आयने में दिखा पर उस आयने में जमी थी धूल। लेकिन उस धूल के होने के बावजूद जो चेहरा दिख पाया था वो भी काफी खूबसूरत था। एक बार और मेरी चेहरा देखने की चेष्ठा धरी की धरी रह गई थी।

हम स्टेशन पहुंच चुके थे। गाड़ी के रुकते ही, पिछली सीट पर बैठी आकृति का अनुभव उसके उतरने के साथ अभी जा ही रहा था कि उससे पहले ही चश्मे में फिर से धुंध आ चुकी थी। उसका चेहरा फिर धुंधला हो चुका था। मै चश्मा जब तक साफ करता। तब तक मेरे गालों पर एक ठंडे हाथ के स्पर्श ने मुझे रोक लिया। दूसरे गाल पर एक प्यारीसी kiss ने मानो सब कुछ भुला दिया। वो गुलाब सी पंखुड़ियों जैसे होंठ, मेरे गालों पर वो मद्धम सा स्पर्श, मुझे किसी और दुनिया में ले जा चुका था। मै कहां था मुझे खुद याद नहीं था।मै एक अलग ही दुनिया में जाने को था ही कि एक आवाज़ ने मुझे वापस वर्तमान में ला दिया।

” thank you & love you” – उसने जाते जाते कहा ” और sorry हां इतनी ठंड में बुलाने के लिए, तुम्हारी नींद भी खराब करने के लिए, माफ कर देना।”


उसकी आवाज़ हर लफ्ज़ के बाद थोड़ी धीमी होती जा रही थी। मै उसके जाने के बाद भी वहीं रुका रुका रहा, क्यूंकि मै इतनी जल्दी उस अनुभव को भूलना नहीं चाहता था। ये पहली बार था, जब आकृति मेरे इतने पास आई थी। आज सुबह इतनी ठंड में इसलिए आया थी कि वो मेरे गाड़ी के पीछे बैठेगी। लेकिन ये जो अनुभव यहां मिला, इसको मै कभी नहीं भूल पाऊंगा। ये अब मेरे उन अच्छे दिनों में शामिल है जिन्हे मैं दुबारा या कई बार जीना चाहूंगा।जैसे ही मैंने अपना चश्मा साफ कर के पहना। वो आखिर मे जाकर मुडी, और वो चेहरा जो अब तक मेरे लिए धुंधला था आखिरकार साफ साफ नजर आने लगा।
मुझे लग था था कि ये एहसास मानो यही थम जाए, ये वक़्त भी यही रुक जाए। ये कभी ना हुआ था, और ना हो पाएगा। वो इतनी खूबसरत कभी नहीं लगी थी। इस ठंड ने उसके गाल गुलाबी कर दिए थे, होंठ गुलाब की तरह कोमल से लग रहे थे। उसकी जुल्फे हवा के साथ बातें कर रही थी। पर वो बार बार चेहरे को छुपाने के लिए उसके सामने आ जाती थी।

मैं एक बार फिर अपने ख्यालों से बाहर आ चुका था पर इस बार वापस लाने वाली मेरे फोन की घंटी थी।
ये आकृति का ही फोन था।
मैने कॉल उठाया
” बुद्धू! कब तक खड़े रहोगे, जाओ।” उसने कहा।
” मै जा ही रहा था लेकिन सोचा कि तुम्हारी ट्रेन चले जाए। वरना तुम बोलोगी रुके तक नहीं।” मैने जवाब दिया।
” हां बुद्धू, दूसरी लड़कियों को देखने का मौका मिलेगा इसलिए रुक गये होगे। चुप चाप से जाओ।”
” एक ने ही इतना परेशान कर के रखा है वो भी ठंड में,और उसपर दूसरी कौन पागल ढूंढना चाहेगा”
“अच्छा! चलो ब.. बाय and लव यू!”
” हां, टू” मैने फोन रखते हुए कहा।

फिर लौटते वक़्त सारे रास्ते ही उस पूरे सफर को याद करता रहा। जिस रास्ते को मै अमूमन १५ मिनिट में पूरा कर लिया करता था, लौटते वक़्त वो ३० मिनिट में जाकर पूरा हुआ। पर उसका चेहरा, वो पल, वो सफर ! सब मानो दोबारा से हो रहा हो कुछ उस तरह से मेरे जहन में बस गया है। काश एक बार फिर मै उस समय को जी पाता।

खैर आखिर मे वो धुंधला चेहरा मेरे जहन में भी साफ हो चुका था।

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इश्क़ टहल रहा है यहीं कहीं

दो राउंड “फेयर एंड हैंडसम” फेसवाश से मुँह धुल के, सीने से लेके पीठ पर सफेद डिब्बे वाला “पार्क एवेन्यू” डियो से नहा के, साइड से मांग निकाल के और ये भी ध्यान में रख के कि बाल चिपका हुआ न लगे, जब वो लड़की से मिलने जाता तो दुनिया थम सी जाती।

लड़की अपना साइड वाला कुकुरदत्ता निकाल मुस्कुराती हुयी स्कूटी से आती। हरे सूट में क़यामत यूँ ढहती मानो सावन परमानेंट छा गया हो। पतझड़ समंदर में डूब के मर गए हो और बादल सारे जहाँ से भाग कर उसके शहर में भर आएं हो। ऊपर से भूरे रंग का एविएटर। आय हाय हाय हाय हाय हाय। भाईसाहब कतल एकदम।

लड़की को देखते हुए कभी अपनी कमीज़ सही करता तो कभी अपना बाल। एक पल उसकी की आंखों में झांकता तो अगले पल शर्मा के उसकी जूती पे। जब वो रेस्तरों में बैठते तो दुनिया के सारे वेटर उनको जज करने लगते।

“ऑर्डर कीजिये” लड़का कहता। लड़की कहती “आप आर्डर कीजिये” ये सिलसिला दो चार मिनट तक चलता रहता और इतनी देर में लड़का मेन्यू कार्ड में रेटलिस्ट देख के मन ही मन बिल का हिसाब लगाना शुरू कर देता। हिसाब ऐसा के बिल के बाद उसके बस का किराया निकल जाए। बेरोजगारी में इश्क़ बड़ा कीमती होता है।

लड़की “पाव भाजी विथ कोल्ड कॉफी” मंगाती और लड़का “चिली पोटैटो” लड़की जब कॉफी के लिए पूछती तो कहता “अरे नहीं हम चाय कॉफी नहीं पीते है!” कहकर वापस बस का किराया जोड़ता।

ऑर्डर टेबल पे आता। लड़का कांटे वाले चम्मच में चिली पोटैटो का आलू फॅसा के लड़की की तरफ बढ़ाता। लड़की पहली घूरती फिर आजु बाजू देख के लप्प से खा लेती। लड़का सोचता “अभी अपने हाथ से हमको पाव भाजी खिलाएगी” लड़की कहती “तुम भी खाओ न!” ये “आप” से “तुम” पे आने में देर न लगाती”

खाते खाते लड़का पूछता “शादी करेंगी हमसे?” लड़की लड़के को एक टक देखती और कहती “मां पापा को एक लड़का पसंद आगया है!” लड़का कुछ न बोलता। न आई लव यू न टाई लव यू। उसे समझ न आता के चिली पोटैटो खाये या “अब देर हो रही है निकलते हैं” कह कर बस पकड़े।

किसी तरह खा पी के बिल निपटा कर जब लड़का बाहर निकलता तो लड़की को देख के मुस्कुराता। बियाह नही होगा तो क्या साला प्यार तो करते हैं। पर किसी और की हो जाएगी तो दुख होगा।

लड़की स्कूटी स्टार्ट करती और लड़के को बैठा के बसस्टैंड की तरफ निकल जाती। लड़का शीशे से एविएटर लगाए उस बला को देखता। उसकी काजल की नोक लड़के के करेजे पे वार करती। झुमके सर्दी के कोहरे सरीखे उड़ते रहते। महक लीवर तक उतरती रहती। खास महक होती है वो।

सन्नाटा देख लड़का लड़के के गले पे हल्के से चूम लेता। लडक़ी गुस्साती और कहती “दिमाग खराब है क्या?” इतने में स्टेशन आजाता। लड़का बस में बैग रखता और नीचे आकर लड़की को गले लगाने के लिए आगे बढ़ता। लड़की पीछे हट जाती, कहती “मेरा शहर है कोई देख लेगा।”

लड़का गुस्सा का दिखावा करता और कहता के जाओ शाम हो गई है। बस अभी चल देगी। लड़की लड़के की तरफ देखती और कहती “सुनिए” , “कहिये” लड़का उत्सुकता से जवाब देता। “मां पापा को वो लड़का पसंद नही आया। हम चिढ़ा रहे थे आपको!” सुनते ही लड़के के दोनों आंखों में दिल वाला इमोजी बन उठत6। सारी थकान गायब और इतने में बस स्टार्ट हो जाती।

“आई लव यू” लड़का लड़की के कान में हल्के से कहके बस की तरफ चलने लगता। “too” लड़की एविएटर लगाते हुए शार्टकट में जवाब देते हुए स्कूटी स्टार्ट करती।

सुना है लड़के के गाल में गड्ढे पढ़ने लगे है। तब से बरेली के झुमके और काजल मोहब्बत का श्रृंगार कर रहे है। पता नही कहाँ हैं वो दोनों पर इश्क़ टहल रहा है यहीं कहीं, गली गली, शहर शहर! आपको मिला क्या?

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कहानी

नाव चली जा रही थी।
मंझधार में नाविक ने कहा, ‘नाव में बोझ ज्यादा है, कोई एक आदमी कम हो जाए तो अच्छा, नहीं तो नाव डूब जाएगी।’

अब कम हो जाए तो कौन कम हो जाए? कई लोग तो तैरना नहीं जानते थे : जो जानते थे उनके लिए भी तैरकर पार जाना खेल नहीं था। नाव में सभी प्रकार के लोग थे – डॉक्टर, अफसर, वकील, व्यापारी, उद्योगपति, पुजारी, नेता के अलावा आम आदमी भी। डाक्टर, वकील, व्यापारी ये सभी चाहते थे कि आम आदमी पानी में कूद जाए। वह तैरकर पार जा सकता है, हम नहीं।

उन्होंने आम आदमी से कूद जाने को कहा, तो उसने मना कर दिया। बोला, ‘मैं जब डूबने को हो जाता हूूं तो आप में से कौन मेरी मदद को दौड़ता है, जो मैं आपकी बात मानूं?’

जब आम आदमी काफी मनाने के बाद भी नहीं माना, तो ये लोग नेता के पास गए, जो इन सबसे अलग एक तरफ बैठा हुआ था। इन्होंने सब-कुछ नेता को सुनाने के बाद कहा, ‘आम आदमी हमारी बात नहीं मानेगा तो हम उसे पकड़कर नदी में फेंक देंगे।’

नेता ने कहा, ‘नहीं-नहीं ऐसा करना भूल होगी। आम आदमी के साथ अन्याय होगा। मैं देखता हूं उसे। मैं भाषण देता हूं। तुम लोग भी उसके साथ सुनो।’

नेता ने जोशीला भाषण आरंभ किया जिसमें राष्ट्र, देश, इतिहास, परंपरा की गाथा गाते हुए, देश के लिए बलि चढ़ जाने के आह्वान में हाथ ऊंचा कर कहा, ‘हम मर मिटेंगे, लेकिन अपनी नैया नहीं डूबने देंगे… नहीं डूबने देंगे… नहीं डूबने देंगे…।

सुनकर आम आदमी इतना जोश में आया कि वह नदी में कूद पड़ा।

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शंकर पुणतांबेकर